अव्यय (Indeclinable)
ଓଡ଼ିଆ: ଅବ୍ୟୟ ହେଉଛି ଏପରି ଶବ୍ଦ ଯାହାର ରୂପ ଲିଙ୍ଗ, ବଚନ, କାରକ କିମ୍ବା କାଳ ଅନୁସାରେ ପରିବର୍ତ୍ତନ ହୁଏ ନାହିଁ। ଏଗୁଡ଼ିକ ସବୁବେଳେ ନିଜର ମୂଳ ରୂପରେ ବ୍ୟବହୃତ ହୁଅନ୍ତି।
हिन्दी व्याकरण में, अव्यय (अବ୍ୟୟ) उन शब्दों को कहते हैं जिनमें लिंग (ଲିଙ୍ଗ), वचन (ବଚନ), कारक (କାରକ) या काल (କାଳ) के कारण कोई विकार या परिवर्तन (ପରିବର୍ତ୍ତନ) नहीं होता। ये शब्द अपने मूल रूप में ही वाक्य में प्रयुक्त होते हैं। इन्हें अविकारी शब्द (ଅବିକାରୀ ଶବ୍ଦ) भी कहा जाता है।
अव्यय चार प्रकार के होते हैं:
- क्रियाविशेषण (କ୍ରିୟାବିଶେଷଣ): जो क्रिया की विशेषता बताते हैं। (जैसे: धीरे-धीरे, आज, ऊपर)
- सम्बन्धबोधक (ସମ୍ବନ୍ଧବୋଧକ): जो संज्ञा या सर्वनाम का सम्बन्ध अन्य शब्दों से बताते हैं।
- समुच्चयबोधक (ସମୁଚ୍ଚୟବୋଧକ): जो दो शब्दों या वाक्यों को जोड़ते हैं। (जैसे: और, या)
- विस्मयादिबोधक (ବିସ୍ମୟାଦିବୋଧକ): जो हर्ष, शोक, घृणा आदि भावों को व्यक्त करते हैं। (जैसे: अरे!, वाह!)
इस विभाजन को निम्न सारणी द्वारा समझा जा सकता है:
सम्बन्धबोधक अव्यय (Postposition/Preposition)
ଓଡ଼ିଆ: ସମ୍ବନ୍ଧବୋଧକ ଅବ୍ୟୟ ସେହି ଶବ୍ଦ ଅଟନ୍ତି ଯାହା ଏକ ବିଶେଷ୍ୟ ବା ସର୍ବନାମର ସମ୍ବନ୍ଧ ଅନ୍ୟ ଶବ୍ଦ ସହିତ ଦର୍ଶାଏ। ଏଗୁଡ଼ିକ ପ୍ରାୟତଃ ବିଶେଷ୍ୟ/ସର୍ବନାମ ପରେ ଆସନ୍ତି।
सम्बन्धबोधक अव्यय (ସମ୍ବନ୍ଧବୋଧକ ଅବ୍ୟୟ) वे अव्यय हैं जिनसे किसी संज्ञा (ବିଶେଷ୍ୟ) या सर्वनाम (ସର୍ବନାମ) शब्द का सम्बन्ध किसी अन्य शब्द से सूचित होता है। ये शब्द संज्ञा या सर्वनाम के बाद आकर उनका सम्बन्ध वाक्य के अन्य शब्दों से जोड़ते हैं।
उदाहरण:
- माँ के बिना बच्चा रो रहा है।
- गोपाल के साथ हरि आ रहा है।
- सीता के बदले गीता जाएगी।
उपर्युक्त वाक्यों में 'के बिना', 'के साथ', 'के बदले' शब्द क्रमशः बच्चे का माँ से, हरि का गोपाल से, और गीता का सीता से सम्बन्ध सूचित करते हैं।
कुछ अन्य सम्बन्धबोधक अव्यय हैं: (के-) पहले, बाद, ऊपर, नीचे, आगे, पीछे, सामने, पास, निकट, बीच, जरिए, कारण, समान, साथ, सहित, सिवाय, योग्य, प्रतिकूल, आसपास आदि।
परसर्ग (कारक चिह्न)
ଓଡ଼ିଆ: ପରସର୍ଗ ହେଉଛନ୍ତି କାରକ ଚିହ୍ନ ଯାହା ବାକ୍ୟରେ ପଦମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସମ୍ବନ୍ଧ ଦର୍ଶାଏ। ଏଗୁଡ଼ିକ ସାଧାରଣତଃ ବିଶେଷ୍ୟ ବା ସର୍ବନାମ ପରେ ଆସନ୍ତି।
वाक्य में आए पद के साथ अन्य पदों का जो सम्बन्ध होता है, उसे कारक (କାରକ) कहते हैं। कारक को पहचानने के लिए जिन शब्दांशों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें कारक-चिह्न (କାରକ ଚିହ୍ନ) या परसर्ग (ପରସର୍ଗ) कहते हैं। ये चिह्न संज्ञा या सर्वनाम शब्दों के बाद आते हैं, इसलिए इन्हें परसर्ग कहा जाता है। केवल सम्बोधन कारक में ये चिह्न शब्द के पहले आते हैं।
हिन्दी में आठ कारक माने जाते हैं, और प्रत्येक कारक के अलग-अलग कारक-चिह्न (परसर्ग) हैं:
| कारक (କାରକ) | कारक-चिह्न (ପରସର୍ଗ) | |---|---| | 1. कर्त्ता (କର୍ତ୍ତା) | ने, से, को, के द्वारा | | 2. कर्म (କର୍ମ) | को, से | | 3. करण (କରଣ) | से (के द्वारा) | | 4. सम्प्रदान (ସମ୍ପ୍ରଦାନ) | को, के लिए, के निमित्त | | 5. अपादान (ଅପାଦାନ) | से (अलग होने के अर्थ में) | | 6. सम्बन्ध (ସମ୍ବନ୍ଧ) | का, के, की / रा, रे, री / ना, ने, नी | | 7. अधिकरण (ଅଧିକରଣ) | में, पर, को | | 8. सम्बोधन (ସମ୍ବୋଧନ) | हे, अरे, ओ, जी, ए, हलो |
कार्य उदाहरण: वाक्य: "राम ने मेज पर किताब रखी।"
- अव्यय पहचानें: इस वाक्य में कोई स्पष्ट सम्बन्धबोधक अव्यय (जैसे 'के बिना', 'के साथ') नहीं है। हालाँकि, 'पर' एक परसर्ग है जो अधिकरण कारक का चिह्न है।
- परसर्ग और कारक पहचानें:
- 'ने' - कर्त्ता कारक का परसर्ग (राम ने)
- 'पर' - अधिकरण कारक का परसर्ग (मेज पर)
यह दर्शाता है कि परसर्ग और सम्बन्धबोधक अव्यय दोनों ही शब्दों के बीच सम्बन्ध स्थापित करने का कार्य करते हैं, हालाँकि 'अव्यय' एक व्यापक श्रेणी है जिसमें सम्बन्धबोधक अव्यय एक प्रकार है, और 'परसर्ग' कारक चिह्नों को संदर्भित करता है।