गिरिधर कविराय: कवि परिचय (କବି ପରିଚୟ)
ଏହି ଭାଗରେ ଆମେ କବି ଗିରିଧର କବିରାୟଙ୍କ ବିଷୟରେ ଜାଣିବା। ସେ ଜଣେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ନୀତିକାବ୍ୟକାର ଥିଲେ।
गिरिधर कविराय (ଗିରିଧର କବିରାୟ) रीतिकाल (ରୀତିକାଳ) के एक प्रसिद्ध नीतिकाव्यकार (ନୀତିକାବ୍ୟକାର) हैं। उनके जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी (ପ୍ରାମାଣିକ ସୂଚନା) कम मिलती है। शिवसिंह सेंगर (ଶିବସିଂହ ସେଙ୍ଗର) के अनुसार, उनका जन्मकाल 1703 ई. बताया गया है। लोग उन्हें अवध (ଅବଧ) का निवासी (ଅଧିବାସୀ) मानते हैं। 'कविराय' नाम से यह अनुमान लगाया जाता है कि वे जाति (ଜାତି) के भाट (ଭାଟ) थे। उनकी कुंडलियाँ (କୁଣ୍ଡଳିଆ) उत्तर भारत की जनता में बहुत प्रचलित (ପ୍ରଚଳିତ) हैं और इनमें दैनिक जीवन (ଦୈନିକ ଜୀବନ) के लिए अत्यंत उपयोगी (ଉପଯୋଗୀ) बातें कही गई हैं। उनकी रचनाएँ सीधी-सादी तथा सरल भाषा (ସରଳ ଭାଷା) में होने के कारण अधिक लोकप्रिय (ଲୋକପ୍ରିୟ) हुईं। गिरिधर की अधिकतर कुंडलियाँ अवधी भाषा (ଅବଧୀ ଭାଷା) में मिलती हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि 'साई' शब्द वाली कुंडलियाँ उनकी पत्नी द्वारा रचित हैं।
कुंडलिया छंद का स्वरूप (କୁଣ୍ଡଳିଆ ଛନ୍ଦର ସ୍ୱରୂପ)
ଏହି ଭାଗରେ ଆମେ କୁଣ୍ଡଳିଆ ଛନ୍ଦର ବିଶେଷତା ବିଷୟରେ ବୁଝିବା। ଏହା ଏକ ୬ ଧାଡ଼ିର କବିତା।
कुंडलिया एक छह-पंक्ति का छंद (ଛନ୍ଦ) होता है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- यह जिस शब्द से शुरू होता है, उसी शब्द पर समाप्त होता है।
- इसकी दूसरी पंक्ति का अंतिम भाग तीसरी पंक्ति के आरंभ में दोहराया जाता है।
- यह दोहा (ଦୋହା) और रोला (ରୋଲା) छंदों के मेल से बनता है।
उदाहरण के लिए, हम गिरिधर कविराय की एक प्रसिद्ध कुंडलिया का अध्ययन करेंगे:
बिना बिचारे जो करै, सो पाछे पछताय | काम बिगारै आपनो, जग में होत हँसाय || जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावै | खान-पान सनमान, राग रँग मनहिं न भावै || कह गिरिधर कविराय, दु:ख कछु टरत न टारे | खटकत है जिय माँहि, कियो जो बिना बिचारे ||
कुंडलिया की व्याख्या (କୁଣ୍ଡଳିଆର ବ୍ୟାଖ୍ୟା)
ଏହି ଭାଗରେ ଆମେ ଉପରୋକ୍ତ କୁଣ୍ଡଳିଆର ଅର୍ଥ ଏବଂ ଏଥିରୁ ମିଳୁଥିବା ଶିକ୍ଷାକୁ ବିସ୍ତୃତ ଭାବରେ ବୁଝିବା।
शब्दार्थ (ଶବ୍ଦାର୍ଥ):
- बिना बिचारे (ବିନା ବିଚାରି): बिना सोचे-समझे
- पाछे पछताय (ପରେ ପଶ୍ଚାତାପ କରେ): बाद में पछताता है
- काम बिगारै आपनो (ନିଜ କାମକୁ ଖରାପ କରେ): अपना काम बिगाड़ता है
- जग में होत हँसाय (ସଂସାରରେ ହସର ପାତ୍ର ହୁଏ): संसार में उपहास का पात्र बनता है
- चित्त में चैन न पावै (ମନରେ ଶାନ୍ତି ପାଏ ନାହିଁ): मन को शांति नहीं मिलती
- खान-पान सनमान (ଖାଇବା-ପିଇବା, ସମ୍ମାନ): भोजन, पानी और सम्मान
- राग रँग मनहिं न भावै (ମନକୁ ମନୋରଞ୍ଜନ ଭଲ ଲାଗେ ନାହିଁ): मनोरंजन भी मन को अच्छा नहीं लगता
- दु:ख कछु टरत न टारे (ଦୁଃଖ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଟଳେ ନାହିଁ): दुख किसी भी तरह से टलता नहीं है
- खटकत है जिय माँहि (ହୃଦୟରେ ଖଟକି ରହେ): हृदय में खटकता रहता है
- कियो जो बिना बिचारे (ଯାହା ବିନା ବିଚାରି କରାଯାଇଥିଲା): जो बिना सोचे-समझे किया गया था
भावार्थ (ଭାବାର୍ଥ): इस कुंडलिया में कवि गिरिधर कविराय हमें बिना सोचे-समझे कोई भी कार्य न करने की सलाह देते हैं।
- प्रथम दो पंक्तियाँ: कवि कहते हैं कि जो व्यक्ति बिना सोचे-समझे कोई काम करता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। ऐसा करने से वह अपना काम तो बिगाड़ता ही है, साथ ही संसार में उपहास का पात्र (ହସର ପାତ୍ର) भी बन जाता है।
- मध्य की दो पंक्तियाँ: जब व्यक्ति जग में हँसी का पात्र बन जाता है, तो उसे अपने मन में कभी शांति (ଶାନ୍ତି) नहीं मिलती। उसे न तो अच्छा भोजन-पानी (ଖାଇବା-ପିଇବା) अच्छा लगता है, न ही कोई सम्मान (ସମ୍ମାନ) और न ही कोई मनोरंजन (ମନୋରଞ୍ଜନ)। उसका मन किसी भी चीज़ में नहीं लगता।
- अंतिम दो पंक्तियाँ: गिरिधर कविराय कहते हैं कि बिना सोचे-समझे किए गए कार्य का दुख (ଦୁଃଖ) किसी भी तरह से टलता नहीं है। वह दुख हमेशा व्यक्ति के हृदय (ହୃଦୟ) में खटकता रहता है, उसे परेशान करता रहता है।
निष्कर्ष (ସିଦ୍ଧାନ୍ତ): इस कुंडलिया का मुख्य संदेश यह है कि हमें कोई भी कार्य करने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार कर लेना चाहिए। जल्दबाजी या बिना सोचे-समझे किए गए कार्य हमेशा दुख और पछतावे का कारण बनते हैं।