आचार्य विनोबा भावे का परिचय (ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ବିନୋବା ଭାବେଙ୍କ ପରିଚୟ)
ଏହି ବିଭାଗରେ ଆମେ 'ଶ୍ରମର ପ୍ରତିଷ୍ଠା' ନିବନ୍ଧର ଲେଖକ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ବିନୋବା ଭାବେଙ୍କ ବିଷୟରେ ଜାଣିବା। आचार्य विनोबा भावे (ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ବିନୋବା ଭାବେ) का पूरा नाम विनायक राव भावे (ବିନାୟକ ରାଓ ଭାବେ) था। उनका जन्म सितंबर, सन् 1895 को महाराष्ट्र के गंगोदा गांव में हुआ था। वे बचपन से ही बड़े मेधावी (ମେଧାବୀ) थे और गणित तथा संस्कृत जैसे विषयों पर उनका पूरा अधिकार था। अपनी माता की प्रेरणा से वे आजीवन अविवाहित (ଅବିବାହିତ) रहे और देश की सेवा करते रहे। विनोबाजी महात्मा गांधी (ମହାତ୍ମା ଗାନ୍ଧୀ) के आदर्शों से भी प्रभावित थे, जिन्होंने सत्य (ସତ୍ୟ), सेवा (ସେବା) और अहिंसा (ଅହିଂସା) के मार्ग को अपनाया। उनका स्वप्न "सर्वोदय" को साकार करना था। गांधीजी की मृत्यु के बाद, विनोबाजी ने देश-भर में पद-यात्रा (ପଦଯାତ୍ରା) की और भूदान (ଭୂଦାନ), ग्राम-दान (ଗ୍ରାମଦାନ) तथा संपत्ति-दान (ସମ୍ପତ୍ତି ଦାନ) के माध्यम से एक सकारात्मक क्रांति (ସକାରାତ୍ମକ କ୍ରାନ୍ତି) लाने का प्रयास किया। वे भारतीय दर्शन (ଭାରତୀୟ ଦର୍ଶନ) पर गहरी आस्था रखते थे और हिंदी को राष्ट्रभाषा (ରାଷ୍ଟ୍ରଭାଷା) मानते हुए इसके प्रति अपना प्रेम प्रकट किया। उनकी अनेक पुस्तकें हिंदी में हैं, जैसे 'गीता प्रवचन' और 'सर्वोदय विचार'।
श्रम का महत्व और प्रतिष्ठा (ଶ୍ରମର ମହତ୍ତ୍ୱ ଓ ପ୍ରତିଷ୍ଠା)
ଏହି ଅନୁଭାଗରେ, ଆମେ ସମାଜରେ ଶ୍ରମର ଗୁରୁତ୍ୱ ଏବଂ ଏହାର ସମ୍ମାନ ବିଷୟରେ ଆଲୋଚନା କରିବା। 'श्रम की प्रतिष्ठा' निबंध में विनोबाजी ने श्रम (ଶ୍ରମ) के महत्त्व पर प्रकाश डाला है। उनका विचार है कि देश का सर्वांगीण विकास (ସର୍ବାଙ୍ଗୀଣ ବିକାଶ) तभी संभव है जब समूचे नागरिकों का योगदान (ଯୋଗଦାନ) हो। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को कुछ-न-कुछ श्रम करना चाहिए।
शारीरिक और मानसिक श्रम की समानता (ଶାରୀରିକ ଓ ମାନସିକ ଶ୍ରମର ସମାନତା)
ଏଠାରେ ଆମେ ଶାରୀରିକ ପରିଶ୍ରମ ଏବଂ ମାନସିକ କାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟରେ ସମାନତା ବିଷୟରେ ବୁଝିବା। विनोबाजी का मत है कि शारीरिक श्रम (ଶାରୀରିକ ଶ୍ରମ) और दिमागी काम (ମାନସିକ କାର୍ଯ୍ୟ) का मूल्य समान होना चाहिए। समाज में किसी भी प्रकार के श्रम को कम नहीं आँका जाना चाहिए।
श्रमिक ही समाज का आधार: शेषनाग का दृष्टांत (ଶ୍ରମିକ ହିଁ ସମାଜର ଆଧାର: ଶେଷନାଗର ଉଦାହରଣ)
ଏହି ଭାଗରେ, ଆମେ ଶ୍ରମିକମାନଙ୍କୁ ସମାଜର ମୂଳଦୁଆ ଭାବରେ ଦେଖିବା, ଯେପରି ଶେଷନାଗ ପୃଥିବୀକୁ ଧରି ରଖିଛି। निबंधकार ने श्रमिक (ଶ୍ରମିକ) को शेषनाग (ଶେଷନାଗ) सिद्ध करते हुए श्रम की महत्ता स्थापित की है। जिस प्रकार पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर स्थित है और उसके आधार के बिना स्थिर नहीं रह सकती, उसी प्रकार दिन भर शरीर-श्रम करने वाले मजदूर (ମଜଦୁର) जो किस्म-किस्म की पैदावार (ଉତ୍ପାଦନ) करते हैं, वे ही समाज के वास्तविक शेषनाग हैं। सबका आधार उन मजदूरों पर है। भगवान ने मजदूरों को कर्मयोगी (କର୍ମଯୋଗୀ) कहा है। रामायण की सीता और महाभारत के श्रीकृष्ण का उदाहरण देकर भी देश के विकास हेतु श्रम की महत्ता को समझाया गया है।
श्रम और धार्मिक जीवन (ଶ୍ରମ ଓ ଧାର୍ମିକ ଜୀବନ)
ଏହି ଅନୁଭାଗରେ, ଶ୍ରମ କିପରି ଏକ ଧାର୍ମିକ ଜୀବନ ସହିତ ଜଡିତ ତାହା ବୁଝାଯିବ। जो व्यक्ति अपने पसीने (ଝାଳ) से रोटी कमाता है, वह पाप-कर्मों (ପାପ-କର୍ମ) से कोसों दूर रहता है। ऐसे व्यक्ति को धर्म-पुरुष (ଧର୍ମ-ପୁରୁଷ) कहा गया है। दिन भर काम करने से रात को गहरी नींद (ଗଭୀର ନିଦ) आती है, जिससे पाप-चिंतन (ପାପ-ଚିନ୍ତନ) की गुंजाइश (ସମ୍ଭାବନା) नहीं रहती। उदाहरण के लिए, एक किसान (କୃଷକ) जो दिन भर खेत में श्रम करता है, उसे रात में शांतिपूर्ण नींद आती है और उसके मन में बुरे विचार नहीं आते।
कर्मयोगी की अवधारणा (କର୍ମଯୋଗୀର ଧାରଣା)
ଏହି ଭାଗରେ, କେବଳ ଶ୍ରମ କରିବା ଦ୍ୱାରା କେହି କର୍ମଯୋଗୀ ହୁଏ ନାହିଁ, ବରଂ ଏଥିପାଇଁ କିଛି ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ ଗୁଣ ଆବଶ୍ୟକ ତାହା ବୁଝାଯିବ। विनोबाजी स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ़ कर्म (କର୍ମ) करने से कोई कर्मयोगी नहीं होता। यदि मज़दूरों के जीवन में व्यसन (ଖରାପ ଅଭ୍ୟାସ) प्रवेश कर जाते हैं, तो उनका जीवन धार्मिक नहीं रह पाता। हाँ, जो श्रम टालता (ଶ୍ରମରୁ ବିରତ ରହେ) है, वह तो कर्मयोगी हो ही नहीं सकता, क्योंकि उसके पास फाज़िल समय (ଅତିରିକ୍ତ ସମୟ) होता है, जो पाप-चिंतन का कारण बन सकता है।
निष्कर्ष (ସିଦ୍ଧାନ୍ତ) ଏହି ଅନୁଭାଗରେ, ଆମେ ସମାଜରେ ଶ୍ରମର ମହତ୍ତ୍ୱ ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କ ପାଇଁ ଏହାର ଆବଶ୍ୟକତା ଉପରେ ସିଦ୍ଧାନ୍ତ ଆଲୋଚନା କରିବା। संक्षेप में, विनोबाजी का संदेश है कि श्रम केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है। यह व्यक्ति को पाप से दूर रखता है और समाज के विकास का आधार है।
Worked Example: प्रश्न: आचार्य विनोबा भावे के अनुसार शारीरिक श्रम और दिमागी काम का मूल्य कैसा होना चाहिए? उत्तर: आचार्य विनोबा भावे के अनुसार, शारीरिक श्रम और दिमागी काम का मूल्य समान होना चाहिए, क्योंकि दोनों ही समाज के विकास के लिए आवश्यक हैं।