श्रम का गौरव: प्रश्न और अभ्यास
(ଶ୍ରମର ମହତ୍ତ୍ୱ: ପ୍ରଶ୍ନ ଏବଂ ଅଭ୍ୟାସ)
ଏହି ଅଧ୍ୟାୟରେ ଆମେ 'ଶ୍ରମର ଗୌରବ' ବିଷୟରେ ପଢ଼ିବା ଏବଂ ଏହା ଉପରେ ଆଧାରିତ ପ୍ରଶ୍ନ ଓ ଅଭ୍ୟାସ କରିବା।
पाठ का परिचय (ପାଠର ପରିଚୟ)
'श्रम का गौरव' निबंध में विनोबाजी ने कर्मयोग (କର୍ମଯୋଗ) की महत्ता पर बल दिया है। उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लोगों को श्रम करने का आग्रह किया है। विनोबाजी का मानना है कि जो व्यक्ति अपने पसीने से रोटी कमाता है, वह पाप-कर्मों (ପାପ-କର୍ମ) से दूर रहता है। शारीरिक श्रम (ଶାରୀରିକ ଶ୍ରମ) और दिमागी काम (ମାନସିକ କାର୍ଯ୍ୟ) का मूल्य समान होना चाहिए। निबंधकार ने श्रमिकों को शेषनाग (ଶେଷନାଗ) के समान बताया है और रामायण की सीता तथा महाभारत के श्रीकृष्ण का उदाहरण देकर श्रम की महत्ता स्थापित की है।
मुख्य बिंदु (ମୁଖ୍ୟ ବିନ୍ଦୁ)
- कर्मयोग की महत्ता: समाज के सर्वांगीण विकास (ସର୍ବାଙ୍ଗୀଣ ବିକାଶ) के लिए सभी नागरिकों का श्रम में योगदान आवश्यक है।
- श्रम और धर्म: जो व्यक्ति पसीने से रोटी कमाता है, वह धर्म-पुरुष (ଧର୍ମ-ପୁରୁଷ) बन जाता है और पाप उसके जीवन में आसानी से प्रवेश नहीं कर सकता।
- शारीरिक श्रम के लाभ: दिन भर काम करने से रात को गहरी नींद आती है और पाप-चिंतन (ପାପ-ଚିନ୍ତନ) के लिए समय नहीं मिलता।
- श्रमिक शेषनाग के समान: जिस प्रकार पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर टिकी है, उसी प्रकार समाज का आधार दिन भर शरीर-श्रम करने वाले मज़दूरों पर है।
- श्रम टालने का परिणाम: जो श्रम टालता है, उसके जीवन में पाप का प्रवेश होना स्वाभाविक है, क्योंकि उसके पास खाली समय (ଫାଜିଲ ସମୟ) अधिक होता है।
मौखिक प्रश्न (ମୌଖିକ ପ୍ରଶ୍ନ)
ଏହି ପ୍ରଶ୍ନଗୁଡ଼ିକର ଉତ୍ତର ମୁହଁରେ ଦିଅ।
- विनोबाजी ने किस बात पर बल दिया है?
- शारीरिक श्रम और दिमागी काम के मूल्य के बारे में लेखक का क्या विचार है?
- श्रमिकों को किसके समान बताया गया है?
लिखित प्रश्न (ଲିଖିତ ପ୍ରଶ୍ନ)
ଏହି ପ୍ରଶ୍ନଗୁଡ଼ିକର ଉତ୍ତର ଲେଖ।
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लेखक के अनुसार कर्मयोगी कौन होता है? विस्तार से लिखिए।
- उत्तर: लेखक के अनुसार, कर्मयोगी वह व्यक्ति होता है जो केवल श्रम ही नहीं करता, बल्कि अपने पसीने से रोटी कमाता है और पाप-कर्मों से दूर रहता है। वह दिन भर काम करके अपने शरीर को थकाता है, जिससे उसे रात को गहरी नींद आती है और उसे पाप-चिंतन का अवसर नहीं मिलता।
-
विनोबाजी ने श्रमिकों को शेषनाग क्यों कहा है? उदाहरण सहित समझाइए।
- उत्तर: विनोबाजी ने श्रमिकों को शेषनाग इसलिए कहा है क्योंकि जिस प्रकार पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर टिकी हुई है और उसके बिना स्थिर नहीं रह सकती, उसी प्रकार समाज का पूरा आधार दिन भर शारीरिक श्रम करने वाले मज़दूरों पर है। वे विभिन्न प्रकार की पैदावार करते हैं और समाज को चलाते हैं। यदि श्रमिक अपना काम करना बंद कर दें, तो समाज स्थिर नहीं रह पाएगा, ठीक वैसे ही जैसे शेषनाग का आधार टूटने पर पृथ्वी स्थिर नहीं रह पाएगी।
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श्रम न करने वाले व्यक्ति के जीवन में पाप का प्रवेश कैसे होता है?
भाषा बोध (ଭାଷା ଜ୍ଞାନ)
ଏହି ବିଭାଗରେ ଆମେ ଶବ୍ଦ ଏବଂ ବ୍ୟାକରଣ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ପ୍ରଶ୍ନ ଅଭ୍ୟାସ କରିବା।
1. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (ଶୂନ୍ୟସ୍ଥାନ ପୂରଣ କର):
(क) जो अपने पसीने से रोटी कमाता है, वह __________ से कोसों भागता है। (ख) शारीरिक श्रम और दिमागी काम का मूल्य भी __________ होना चाहिए। (ग) सबका आधार उन __________ पर है, इसलिए भगवान ने मज़दूरों को कर्मयोगी कहा है। (घ) जिस जीवन में __________ की गुंजाइश ही न हो उसे धार्मिक जीवन होना चाहिए।
2. सही या गलत लिखिए (ଠିକ୍ କି ଭୁଲ୍ ଲେଖ):
(क) केवल श्रम करने से कोई कर्मयोगी नहीं होता। (ख) जो काम नहीं करते उनके जीवन में पाप नहीं होता। (ग) भगवान ने मज़दूरों को कर्मयोगी कहा है।
3. निम्नलिखित शब्दों के अर्थ लिखिए (ନିମ୍ନଲିଖିତ ଶବ୍ଦଗୁଡ଼ିକର ଅର୍ଥ ଲେଖ):
- कर्मयोग (କର୍ମଯୋଗ)
- महत्ता (ମହତ୍ତ୍ୱ)
- व्यसन (ବ୍ୟସନ)
- सर्वांगीण (ସର୍ବାଙ୍ଗୀଣ)
- गुंजाइश (ସମ୍ଭାବନା)
श्रम का महत्व (ଶ୍ରମର ମହତ୍ତ୍ୱ)
ଶ୍ରମର ମହତ୍ତ୍ୱକୁ ଏକ ସରଳ ଫ୍ଲୋଚାର୍ଟ ମାଧ୍ୟମରେ ଦେଖାଯାଇପାରିବ।
यह दर्शाता है कि शारीरिक श्रम कैसे एक व्यक्ति को धार्मिक जीवन की ओर ले जाता है।
उदाहरण प्रश्न (ଉଦାହରଣ ପ୍ରଶ୍ନ)
प्रश्न: विनोबाजी के अनुसार शारीरिक श्रम और दिमागी काम के मूल्य में क्या संबंध होना चाहिए?
हल: विनोबाजी के अनुसार, शारीरिक श्रम और दिमागी काम का मूल्य समान होना चाहिए। वे दोनों ही समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं और किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ नहीं मानना चाहिए।
यह सूत्र दर्शाता है कि दोनों प्रकार के श्रम का महत्व बराबर है।