परिचय
ଏହି ଅନୁଭାଗରେ ଆମେ ସି.ଭି. ରମଣଙ୍କ ବିଷୟରେ ସାଧାରଣ ପରିଚୟ ପାଇବା। भारतवर्ष ने विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय उन्नति की है, जिससे आज सारा विश्व परिचित है। आचार्य चंद्रशेखर वेंकटरमण (ଚନ୍ଦ୍ରଶେଖର ଭେଙ୍କଟରମଣ) एक ऐसे ही उच्च कोटि के वैज्ञानिक (ବୈଜ୍ଞାନିକ) थे, जिनकी खोजों को विश्व भर में सराहा गया। उन्हें अत्यंत सम्माननीय (ସମ୍ମାନନୀୟ) नोबेल पुरस्कार (ନୋବେଲ ପୁରସ୍କାର) से सम्मानित किया गया, जिससे भारत का मस्तक गर्व से ऊँचा उठ गया। [[1], [4]]
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
ଏହି ଭାଗରେ ଆମେ ତାଙ୍କର ପିଲାଦିନ ଓ ଶିକ୍ଷା ବିଷୟରେ ଜାଣିବା। प्रसिद्ध वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकटरमण का जन्म 17 नवंबर, 1888 को दक्षिण भारत के त्रिचनापल्ली (ତ୍ରିଚିନାପଲ୍ଲୀ) नगर में हुआ था। उनके पिता, श्री चंद्रशेखर अय्यर, हाईस्कूल में भौतिक शास्त्र (ଫିଜିକ୍ସ) के अध्यापक (ଅଧ୍ୟାପକ) थे, और उनकी माता, श्रीमती पार्वती, एक विदुषी (ବିଦୁଷୀ) तथा धार्मिक विचारों की महिला थीं। रमण बचपन से ही विज्ञान के प्रति रुझान (ଆଗ୍ରହ) रखते थे और संगीत में भी उनकी रुचि थी। वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि (ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବୁଦ୍ଧି) के थे। उन्होंने चौदह वर्ष की आयु में ही भौतिक शास्त्र में स्नातक (ସ୍ନାତକ) की उपाधि प्राप्त कर ली और मद्रास विश्वविद्यालय (ମାଡ୍ରାସ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟ) में प्रथम स्थान प्राप्त किया, जिसके लिए उन्हें 'अर्णी स्वर्ण पदक' से सम्मानित किया गया। [[1]]
वैज्ञानिक प्रतिभा का प्रदर्शन
ଏହି ଅନୁଭାଗରେ ଆମେ ତାଙ୍କର ବୈଜ୍ଞାନିକ ପ୍ରତିଭା କିପରି ପ୍ରକାଶ ପାଇଲା ତାହା ଦେଖିବା। स्नातकोत्तर (ସ୍ନାତକୋତ୍ତର) शिक्षा के दौरान, रमण ने एक ऐसे परीक्षण की समस्या का मूल कारण (ମୂଳ କାରଣ) तुरंत पहचान लिया, जिसे उनके प्रोफेसर (ପ୍ରଫେସର) भी हल नहीं कर पाए थे। उन्होंने अपनी इस उपलब्धि को एक लेख के रूप में लिखा और प्रोफेसर को दिया, जिसे उन्होंने साधारण समझा। परंतु रमण जानते थे कि यह भौतिकी (ଭୌତିକୀ) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण खोज थी। उन्होंने यह लेख इंग्लैंड की 'फिलोसोफिकल मैगजीन' में भेजा, जहाँ इसके प्रकाशित होने के बाद इसकी चर्चा होने लगी। धीरे-धीरे वे संसार भर में प्रसिद्ध हो गए। [[1]]
कैरियर और अनुसंधान
ଏହି ଭାଗରେ ଆମେ ତାଙ୍କର କ୍ୟାରିଅର ଓ ଗବେଷଣା ବିଷୟରେ ଜାଣିବା। भारत सरकार ने उन्हें विदेश (ବିଦେଶ) में उच्च शिक्षा (ଉଚ୍ଚ ଶିକ୍ଷା) के लिए स्वीकृति दी, लेकिन स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण उन्हें स्वदेश (ସ୍ୱଦେଶ) लौटना पड़ा। इस दौरान, उन्होंने अखिल भारतीय अर्थ प्रतियोगिता परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर कोलकाता (କୋଲକାତା) में उपनिदेशक (ଉପନିର୍ଦ୍ଦେଶକ) का पद संभाला। एक दिन 'भारतीय विज्ञान संघ' का बोर्ड देखकर वे वहाँ पहुँचे और सदस्य बन गए। उन्हें विदेश में रहकर खोज करने की सलाह दी गई, परंतु उन्होंने अपने देश में रहकर ही अनुसंधान (ଅନୁସନ୍ଧାନ) करने का निश्चय किया। [[1]]
रमण प्रभाव और अन्य खोजें
ଏହି ଅନୁଭାଗରେ ଆମେ ତାଙ୍କର ମୁଖ୍ୟ ଆବିଷ୍କାର 'ରମଣ ପ୍ରଭାବ' ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଗବେଷଣା ବିଷୟରେ ପଢ଼ିବା। रमण ने अपने देश में रहकर ही विशेष प्रकार की प्रकाश किरणों (ଆଲୋକ ରଶ୍ମି) की खोज की, जिन्हें बाद में 'रमण किरण' (ରମଣ କିରଣ) नाम दिया गया। उनकी खोजों के बाद ही यह स्पष्ट हो गया कि आकाश (ଆକାଶ) तथा समुद्र (ସମୁଦ୍ର) का जल नीला क्यों दिखाई देता है। उन्होंने यह भी खोज की कि जिन धातुओं (ଧାତୁ) के पार नहीं देखा जा सकता, उनमें भी प्रकाश का प्रवेश (ପ୍ରବେଶ) होता रहता है। समस्त विश्व उनकी इन अनूठी खोजों से हैरान रह गया। [[1], [2]]
उदाहरण: रमण प्रभाव (Raman Effect) ने प्रकाश के प्रकीर्णन (scattering) की एक नई घटना को उजागर किया। जब प्रकाश किसी पारदर्शी माध्यम से गुजरता है, तो उसका कुछ हिस्सा अपनी तरंगदैर्ध्य (wavelength) बदल देता है। यह बदलाव माध्यम के अणुओं (molecules) के साथ प्रकाश के संपर्क के कारण होता है। इस खोज ने पदार्थों की आंतरिक संरचना (internal structure) को समझने में क्रांति ला दी। उदाहरण के लिए, समुद्र का जल नीला इसलिए दिखाई देता है क्योंकि जल के अणु सूर्य के प्रकाश के नीले घटक को अधिक प्रकीर्णित (scatter) करते हैं, जबकि अन्य रंग अवशोषित (absorbed) हो जाते हैं या कम प्रकीर्णित होते हैं। यह घटना रमण के सिद्धांतों द्वारा समझाई गई।
सम्मान और पुरस्कार
ଏହି ଭାଗରେ ଆମେ ତାଙ୍କୁ ମିଳିଥିବା ସମ୍ମାନ ଓ ପୁରସ୍କାର ବିଷୟରେ ଜାଣିବା। रमण ने रूस, जर्मनी, इंग्लैंड, अमेरिका, इटली आदि अनेक देशों में अपनी खोजों के बारे में भाषण दिए। सन 1929 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस (ଭାରତୀୟ ବିଜ୍ଞାନ କଂଗ୍ରେସ) ने उन्हें अपना अध्यक्ष (ଅଧ୍ୟକ୍ଷ) बनाया। सन 1930 में उन्हें विश्व का सर्वाधिक (ସର୍ବାଧିକ) सम्माननीय नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई। सन 1954 में भारत सरकार ने उन्हें 'भारत रत्न' (ଭାରତ ରତ୍ନ) से सम्मानित किया। [[2]]
निष्कर्ष
ଏହି ଭାଗରେ ଆମେ ତାଙ୍କର ମହାନତା ଓ ଭାରତ ପାଇଁ ତାଙ୍କର ଯୋଗଦାନ ବିଷୟରେ ସିଦ୍ଧାନ୍ତ କରିବା। निश्चित रूप से, आचार्य चंद्रशेखर वेंकटरमण की असाधारण प्रतिभा (ଅସାଧାରଣ ପ୍ରତିଭା) के कारण भारतवर्ष का मस्तक गर्व से सदा ऊँचा रहेगा। उनकी खोजों ने न केवल विज्ञान को समृद्ध किया, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर एक पहचान भी दिलाई। [[2]]